इंडियन एजुकेशन सिस्टम इन हिंदी

जब हम स्कूल में पढ़ते थे , तो हमारे एक अध्यापक थे | उनकी खास बात यह थी की उनका फोकस बच्चों को पढ़ने से ज्यादा
पीटने में होता था |

जिस टाइम स्टूडेंट्स प्रेयर टाइम ग्राउंड में एकत्रित होत्ते थे तो वह अपनी दिव्या दृष्टि से सबको देख लेते थे और रोज़ाना उन बच्चों में 2-4 बचे ऐसे निकlल कर सामने खड़ा कर देते थे जिनके या कपडे धुले नहीं होते थे या जिनके बाल लम्बे हो |
जिनके बाल लम्बे होते थे | वह उनको ताबड़ लात घूसे बरसाते थे | मान लिया जाये बड़े बाल रखना बुरी आदत होती है |
लेकिन वो जिन कारणों से बुरी होती है , वो कारण बच्चों को बताओ | बड़े बाल रखने के नुक्सान बताओ |
अगर नहीं समझा सकते तो सजा खुद को दो न के बच्चे को |
क्योंकि आप एक अच्छे सिखाने वाले नहीं बन सके | असल में हमारी शिक्षा व्यवस्था बेहद खराब है हम बच्चों को सिखाने या समझने
पर ध्यान नहीं देते, बल्कि रटाने पर देते है | और अगर रट्टा मारने में निपुण न हो तो उनको सजा देते है |
असल में शिक्षा का मकसद ज्ञान अर्जित करना है |
लेकिन ये उदेश्य बदलकर सिर्फ जीविका के लिए नौकरी हासिल करना रह गया है |
पढ़ाई पूरी करने पर अगर सरकारी नौकरी खुशकिस्मती से या फिर प्राइवेट (Private) जॉब मिल जाए तो ठीक
है वर्ना आपको अपने घर के पास बनी चौपाल में ताश
खेल कर समय बिताने के अलावा और कोई चारा नहीं रहता
क्योंकि ज़िन्दगी का बहुत बड़ा मूल भाग स्कूल या कॉलेज
में बिताकर भी आप अपना हुनर विकसित नहीं कर पाए |आप जानते है दिवाली पर लगने वाली Chinese लाइट
20-30 Rs. में मिल जाती है | इन लाइट्स में रंग बिरंगे छोटे छोटे बल्ब लग्गे होत्ते है |
वायर भी इस्तेमाल होती है तो भी ये सस्ती क्यों होती है | क्योंकि इस तरह के लाइट्स बनाना बड़े पैमाने पर लघु उद्योग बन चुके है | चीन की औरतें किचन से टाइम निकल कर सुबह शाम इस तरह की लाइट्स बनाती है | फुरसत में किये गए इन्ही काम से वे
अच्छे पैसे कमा रही है | जबकि हमारे देश में औरतें सास-बहु के सीरियल या फिर सर्दियों के लिए स्वेटर बुनती है |
चीन में लघु उद्योग का आईडिया स्कूल के समय से ही सिखाया जाता है | जहाँ तक हमारे स्कूल की व्यवस्था की बात की जाए सब याद करने पर आधारित है , समझने पर नहीं | स्कूल्ज की हालत जेल जैसी हो चुकी है | जहाँ जबरन बच्चों को कैद करके रट्टे लगवाए जाते है |परीक्षा और पढ़ाई वाले जंजाल से मुक्त होते ही हम पढ़ना छोड़ देते है | अगर किसी को पढता हुआ देखे तो उनसे पूछते है की भाई इतना क्या पढ़ रहे हो | आपके परिवार के लोग ही पूछ लेते है अगर किसी नौकरी की तयारी नहीं कर रहे हो तो क्यों पढ़ रहे हो | वास्तव में पढाई का मकसद सिर्फ नौकरी पाना ही नहीं होना चाहिए बल्कि पढ़ने से हमें वो ज्ञान मिलता है जो हमारे सामान्य जीवन में काम आता है | उदहारण के तौर पर आज से सैकड़ों साल पहले एक महापुरुष ने खोजबीन करके बताया की विटामिन A की कमी से खून की कमी मतलब एनीमिया नामक रोग होता है |. फिर दूसरे महापुरुष ने बताया की गाजर, शकरकंदी, में प्रचुर मात्रा में विटामि होता है |
अब इन महापुरुष द्वारा की गयी खोजों का मतलब यह नहीं था की आप इनका रट्टा मार ले और परीक्षा में पूछे जाने पर इसका उत्तर लिख दे बल्कि उनका मकसद इस तरह के रोगों से दूर रखना था |
स्कूल में शिक्षा की व्यवस्था ऐसी होनी की विद्यार्थी अपने मन से पढ़े , न की दूसरे को पछाड़ने में | स्कूल और कॉलेज में ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए की विद्यार्थी अपने पसंद का विषय विस्तार से पढ़ सके और शोध कर सके |

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