जहाँ 21 सिख भिड़ गए दस हज़ार पठानों से- सारागढ़ी की लड़ाई

सारागढ़ी की लड़ाई (Battle Of Saragarhi) एक कहानी जैसी लगती है लेकिन ये कोई कहानी नहीं बल्कि एक सच्ची घटना है । जब एक तरफ से 12000 अफ़ग़ानी लुटेरों ने हमला बोला था तो उनसे मुक़ाबला करने के लिए वहां सिर्फ 21 सिख़ मौजूद थे, उसके बाद शुरू हुई थी दुनिया की सबसे महान लड़ाई। घटना 1897 की है , नार्थ वेस्ट फ्रंटियर स्टेट (North West Frontier State ) में 12000 अफ़ग़ानों ने हमला कर दिया। वे गुलिस्तां और लोखार्ट के किलों पर पर कब्ज़ा करना चाहते थे। इन किलों को महाराजा रणजीत सिंह ने बनवाया था। इन किलों के पास सारागढ़ी में एक सुरक्षा चौकी थी, जहाँ पर 36 सिख़ रेजिमेंट के 21 जवान तैनात थे। 36 सिख़ रेजिमेंट में सिर्फ साबत सूरत यानी वे सिख़ जो केश धारी होते हैं भर्ती किये जाते थे। ईशर सिंह के नेतृत्व में तैनात इन 21 जवानो को पहले ही पता चल गया था की अफ़ग़ानों की संख्या 12000 से ज़्यादा है और वो सिर्फ 21 थे। ऐसी सूरत में ज़िंदा बचना नामुम्किन था ।

फिर भी इन जवानो ने लड़ने का फैसला किया और 12 सितम्बर 1897 को सिख़ लैंड की धरती पर एक ऐसी लड़ाई हुई जो दुनिया की 5 महानतम लड़ाइयों में गिनी गयी। बहार से कहीं मदद मिलने की कोई उम्मीद नहीं थी। लांस नायक लाभ सिंह और भगवान् सिंह ने गोली चलना शुरू कर दिया। हज़ारों की संख्या में आये अफ़ग़ानों की गोली का पहला शिकार बने भगवान् सिंह जो की मुख्या द्वार पर दुश्मन को रोक रहे थे। उधर सिखों के हौसले से अफ़ग़ानों के कैंप में हड़कंप मच गया , उन्हें ऐसा लगा मानो कोई बहुत बड़ी सेना अभी भी किले के अंदर ही है।

उन्होंने किले पे कब्ज़ा करने के लिए दीवार तोड़ने की असफल कोशिश की। हवलदार ईशर सिंह ने बड़ी कुशलता से नेतृत्व सँभालते हुए सैकड़ों अफ़ग़ानों को गोलियों से भून डाला। लेकिन कुछ ही समय बाद उनकी गोलियां ख़तम हो गयी तभी उन्होंने अपनी टोली के साथ गरजते हुए जो “बोले सो निहाल सत्श्रीअकाल ” का नारा लगाया और दुश्मन पर निहत्ते ही झपट पड़े। कहा जाता है की बिना किसी हथियार के सिर्फ हाथापाई में उन्होंने 20 से भी अधिक पठानों को मौत के घात उतार दिया था और उनकी बंदूके छीन कर अपने साथियों की तरफ उछाल दी। तभी गुरुमुख सिंह गरजते हुए बोले की हम भले ही संख्या में कम हो पर हमारे हाथों में दो- दो bandukein हो गयी हैं और हम आखिरी सांस तक लड़ेंगे । और सभी सिख़ भूखे शेरों की तरह अफ़ग़ानी कुत्तों पर टूट पड़े।

अफ़ग़ानों से लड़ते -लड़ते सुबह से रात हो गयी और सभी 21राण बाँकुरे शहीद हो गए थे, लेकिन अपने जीते जी उन्होंने उस विशाल फ़ौज के आगे आत्मसमर्पण नहीं किया और 1400 अफ़ग़ानों को मौत के घाट उतार दिया गया था। अफ़ग़ानियों को इस लड़ाई में भारी नुक्सान सहना पड़ा लेकिन वो किले को फ़तेह नहीं कर पाए। सिख़ जवान आखिरी सांस तक लड़े और इस किले को बचा लिया। जब ये खबर यूरोप पहुंची तो पूरी दुनिया उन सरदारों की बहादुरी के आगे सन्न रह गयी। ब्रिटैन के संसद में सभी ने खड़े होकर इन 21 वीरों की बहादुरी को सलाम किया। इन सभी को मरणोपरांत इंडियन आर्डर ऑफ़ मेरिट (Indian Order Of Merit ) दिया गया जो आज के परमवीर चक्र के बराबर था। पर अफ़सोस होता है की जो बात हर भारतीय को पता होनी चाहिए उसके बारे में कम ही लोग जानते हैं। ये लड़ाई यूरोप के स्कूलों की किताबो में पढाई जाती है पर हमारे यहाँ कोई जानता तक नहीं।

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