सफलता के लिए क्या ज्यादा जरूरी है ? मेहनत या किस्मत

आम तौर पर जिसे लोग किस्मत कहते हैं उसे वह खुद बनाते हैं लेकिन बिना जाने। बिना जाने ऐसे की हमारे शरीर में हर पल भोतिक गतिविधियां चल रही हैं, मानसिक प्रतिक्रियाएं ,भावनाएं भी हैं ओर जीवन ऊर्जा तो सक्रिय है ही। वह हर पल हजारों सूचनाएं ग्रहण करता रहता है चाहे आप जागरूक हों या ना हों। ओर इन सब प्रिक्रयो में से सिर्फ 1% या उससे भी कम चीज़े हम जागरूकता के साथ करते हैं।, बाकी सारी गतिविधियों को हमारा शरीर उन्हें पहचानता ओर दर्ज करता रहता है।

पूरे दिन ओर रात यह होता ही रहता है चाहे आप जाग रहे हो या सो रहे हों। तो अगर आप इन सब गतिविधियोंमें से मात्र 1% गतिविधियों के प्रति ही जागरूक होंगे जिसका मतलब कि अगर आप अपने साथ हो रही 99% चीजे अनजाने में करते हैं, बिना जागरूकता के तो जीवन एक संयोग की तरह ही लगेगा।

जब किसी इंसान के साथ कोई सुखद संयोग हो जाए या उसका फायदा हाेजाए तो लोग उसे अच्छी किस्मत के देते हैं या यह भी कह देते हैं कि भगवान उनकी मदद के रहा है।इस तरह संयोग से भाग्यशाली होना या उसपर निर्भर होकर जीना या बिना जाने ही संयोग से चीज़े होने देना जीना का तरीका नहीं है। तो जब तक कोई इंसान अपनी किस्मत बनाने का ज़िम्मा खुद अपने ऊपर नहीं लेता, तो उसे ही विकास से जुड़ी समस्या है।

वह अभी भी पूरी तरह विकसित नहीं हुए हैं, उन्हें चीज़े किस्मत पे निर्भर ही लगेंगी। क्युकी इंसान होने का अर्थ यही है कि हम अपना जीवन जागरूकता से ओर जैसे चाहे वैसे चला सकते हैं तो ये किस्मत वाली बात सिर्फ अपनी असफलता को संभालने का एक अच्छा बहाना है। असफल होने पर इल्ज़ाम किस्मत पर डालना सही नहीं है।

हमारी संस्कृति ने प्राचीन समय से ही हमें सिखाया है कि आपका जीवन आपके कर्म पर ही निर्भर है। अपना जीवन हम खुद बनाते हैं ना कि भगवान भरोसे या किस्मत के सहारे उसपर कोई फ़र्क पड़ता है। हमारे रास्ते में क्या चीज़े आती है या हमारे उपर क्या फेंका जाता है वो हमारे हाथ में नहीं होता, मगर जब लाखो चीजे का हमपर प्रभाव पड़ता है तो उससे हम क्या बनाते हैं वह 100% हमारे हाथ में होता है। बस ज़रूरत होती है

अपने साथ हो रही गतिविधियों के प्रति जागरूक होकर उनका प्रभाव अपने हिसाब से तरह करें। ओर इसी बात से आपका सामर्थ्य तह होता है कि आप बिना किस्मत पे सब छोड़े अपनी मर्ज़ी से अपने साथ हो रही गतिविधियों से क्या बनके दिखाएंगे।

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